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Thursday, May 14, 2020

पुलिस प्रताणना का शिकार पत्रकार

वर्दीधारी गुंडों की गुंडई, कासगंज के बाद वाराणसी में पत्रकार पर टूटा खाकी का कहर 
कासगंज/वाराणसी/रेनूकूट |
योगी राज में भी पत्रकारों के साथ अमानवीय व्यवहार, हिंसक मारपीट रुकने का नाम नहीं ले रही । अपनी गलतियों पर पर्दा डालने एवं खबरों से खिसियाये लोग किस तरह पत्रकारों को शिकार बना रहे हैं । इसे बताने की जरूत नहीं, कासगंज में कबरेज करते पत्रकार से पुलिसकर्मी द्वारा मारपीट और अभद्रता करने का मामला अभी ठंडा भी नहीं हो पाया कि उससे पहले ही वाराणसी में पुलिस द्वारा पत्रकार को जान से मारने के उद्देश्य से लहुलुहान कर दिया | दोनों ही मामलों में अब तक की कार्यवाई ढाक के तीन पात ही हैं |
बतादें कि लोक डाउन की कबरेज करते कासगंज के मनीष कुमार से कासगंज सीओ सदर के हमराह सिपाई द्वारा गाली गलौज के साथ मारपीट व अभद्रता की गयी मामले की जाँच पुलिस अधीक्षक ने सीओ सहावर से कराई, पीड़ित पत्रकार ने घटना के सभी साक्ष्य भी जांच अधिकारी को दे दिये बाबजूद आज तक आरोपी सिपाही के खिलाफ कार्यवाई नहीं की गयी | हालांकि पुलिस कर्मचारियों से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के इस रवैये से पत्रकारों में आक्रोश हैं जो कभी भी ज्वालामुखी का रूप ले सकता हैं | लेकिन यह मामला तो जनपद कासगंज के पत्रकार का हैं जिसे लोग भूल भी नहीं पाए कि उससे पहले ही वाराणसी के रेनूकूट इलाके में दिनांक 7 मई 2020 की शाम को आधा दर्जन से ज्यादा रंगरूट पुलिस कर्मियों ने पत्रकार अजीत कुमार कुशवाहा को अकारण स्थानीय पुलिस की शह पर घेर कर बेहिसाब लाठियां बरसाते हुये अधमरा कर दिया । मरणासन्न हालत देख परिजनों ने जब शोर मचाया तो पास ही चन्द कदम की दूरी पर खड़े चौकी प्रभारी रेनूकूट गोवर्धन सिंह और थाना प्रभारी पिपरी अभय नारायण तिवारी मौके पर आए और उन्होंने हमलावर पुलिसकर्मियों को मौके से भगा दिया । इतना ही नहीं दिखावटी सहानुभूति के लिये गम्भीर रूप से घायल हो चुके पत्रकार अजीत कुशवाहा को तड़पा तड़पा कर मार डालने की नीयत से बिलम्ब करते हुये पहले तो एक सामान्य डाक्टर के पास ले गए, लेकिन उसके द्वारा इलाज से इंकार करने पर नामी गिरामी हिन्डाल्को के अस्पताल ले गये । इस दौरान गुजरते समय के बीच पत्रकार अजीत कुशवाहा दर्द से तड़पता रहा पर कठोर दिल पुलिसकर्मियों का दिल नही पसीजा उपचार में की जा रही देरी के कारण घंटों का समय सेकिंडों की भांति गुजरता गया । फ्रैक्चर के स्थान पर बिना प्लास्टर के मामूली पट्टिया बाँध दी गयी | उसके बाद कराया करीब तीन घंटे का समय पास करने के बाद दर्द से बेहाल अजीत को अमानवीयता की हदें पार करते हुए क्षेत्राधिकारी पिपरी कार्यालय ले जाया गया । स्थिति कुछ ऐसी बना दी गयी कि माननीय उच्चतम न्यायालय और मानवाधिकार आयोग के सभी आदेश निर्देश को ताख में रख क्षेत्राधिकारी ने भी उपचार कराने के बजाय पुलिसकर्मियों को बचाने के लिए व्यर्थ की पूछताछ में समय गुजार दिया । बताते हैं कि उपर से नीचे तक चल रही साजिशों के चलते न पत्रकार को उपचार मिला और न न्याय | समझ तो यह नहीं आता कि शेतानियत का यह खेल आखिर चलेगा तो कब तक ? क्योंकि आज माहौल कुछ इस तरह बनता जा रहा हैं कि गलत करने बाले अपनी कमियों पर पर्दा डालने के लिए पत्रकारों के साथ दुश्मनों जेसा व्यवहार करने लगे हैं | जिस पर सरकार ने शीघ्र कदम नहीं उठाया तो पुलिस और प्रेस के प्रेम में नफरत के अंकुर फुट सकते हैं |

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